वैदिक भारत विश्व गुरु था, जिससे दुनिया को ज्ञान के प्रकाश की प्रथम किरण प्राप्त हुई। यह देव भूमि कहलाता था। “जब दुनिया में मनुष्य अपनी रंगी हुई देह पर कच्ची खाल पहनते थे और जंगलियों की भाँति घूमा करते थे इतिहास के उस पुराने काल में भी भारत अत्यंत उच्च कोटि की सभ्यता का आनंद ले रहा था।”(लॉर्ड मैकौले, इंडिया मदर ऑफ अस ऑल; पेज. 27) संसार को लौकिक और पारलौकिक ज्ञान से अभिभूत करने वाला, वेदों का प्रणेता, प्राणीमात्र में ईश्वरीय चेतना का दर्शन करने वाला यह देश आखिर अपने ज्ञान, वैभव, सभ्यता व संस्कृति को अक्षुण्ण क्यों नहीं रख सका? ऐसे आदर्श समाज की अवनति व पराभव के क्या कारण रहे? वास्तव में जो देश अपनी सभ्यता और संस्कृति से कट जाता है वह नष्ट हुई जड़ वाले वृक्ष की गति को प्राप्त होता है। जैसे जड़, तना और पत्तियाँ एक दूसरे के संपोषक हैं उसी तरह राष्ट्र, संस्कृति और समाज एक दूसरे के संपोषक हैं। देश, राज्य, जनपद, नगर और ग्राम के बाद परिवार समाज की लघुतम इकाई होता है। और परिवार की इकाई होता है मनुष्य। मनुष्यों में स्त्री और पुरुष दोनों का प्रत्येक दृष्टि से समान महत्त्व है। किसी एक वर्ग की उपेक्षा परिवार व समाज से लेकर राष्ट्र तक में असंतुलन उत्पन्न कर देती है। भारत को इसी असंतुलन का ग्रहण लगा। क्योंकि भारतीय दृष्टि सर्व समावेशी है इसीलिए अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों ने भारतीय संस्कृति पर अपना प्रभाव आसानी से छोड़ दिया जिससे समाज में अनेक कुरीतियों ने जन्म ले लिया और इनमें से एक महत्वपूर्ण कुरीति थी नारी की उपेक्षा तथा उसके अधिकारों का पुरुषों द्वारा अतिक्रमण।